जयराम रमेश का संसद में संबोधन
भारतीय राजनीति में इतिहास के नायकों और उनकी भूमिका को लेकर अक्सर बहस होती रहती है। हाल ही में संसद में दिए गए एक तीखे भाषण में, वरिष्ठ नेता जयराम रमेश ने इतिहास के साथ हो रही छेड़छाड़ और जवाहरलाल नेहरू की विरासत को बचाने के लिए कई महत्वपूर्ण सवाल उठाए हैं। यह लेख इस भाषण के प्रमुख अंशों और इसमें शामिल राजनीतिक हस्तियों के उल्लेख के माध्यम से इस पूरी बहस को विस्तार से समझाता है।
जिन्ना की प्रशंसा और ‘तुष्टिकरण’ का अंतर्विरोध
जयराम रमेश ने अपने संबोधन में “तुष्टिकरण” (appeasement) के आरोपों पर कड़ा प्रहार किया।
उन्होंने कुछ ऐतिहासिक घटनाओं का संदर्भ देते हुए बताया कि किस तरह वे लोग, जो दूसरों पर तुष्टिकरण का आरोप लगाते हैं, स्वयं मोहम्मद अली जिन्ना के प्रति नरम रुख अपनाते रहे हैं।
उन्होंने विशेष रूप से लालकृष्ण आडवाणी की पाकिस्तान यात्रा का उल्लेख किया।
रमेश के अनुसार, आडवाणी जी कराची गए और वहां उन्होंने जिन्ना की प्रशंसा की।
जयराम रमेश ने सवाल खड़ा किया कि क्या इसे तुष्टिकरण नहीं माना जाना चाहिए?
इसके अलावा, उन्होंने 2009 में प्रकाशित जिन्ना की एक जीवनी (Biography) का भी जिक्र किया।
इस पुस्तक के लेखक जसवंत सिंह थे, जो अटल बिहारी वाजपेयी जी के नेतृत्व वाली सरकार में देश के महत्वपूर्ण पदों—वित्त मंत्री और विदेश मंत्री—पर रह चुके थे।
रमेश का कहना है कि नेहरू के प्रति अत्यधिक नफरत के कारण ही इन नेताओं ने जिन्ना को “गले लगाने” या उनकी प्रशंसा करने का मार्ग चुना।
नेहरू के खिलाफ “भयंकर प्रोजेक्ट”
स्रोतों के अनुसार, जयराम रमेश ने आरोप लगाया कि वर्तमान में नेहरू की छवि को धूमिल करने के लिए एक “भयंकर प्रोजेक्ट” चलाया जा रहा है। उनका मानना है कि इस प्रोजेक्ट का उद्देश्य नेहरू के योगदान को छोटा दिखाना और उन्हें भारतीय इतिहास में एक नकारात्मक पात्र के रूप में पेश करना है।
जयराम रमेश ने चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि यह अभियान इतना प्रभावशाली है कि इसमें देश के रक्षा मंत्री जैसे गंभीर व्यक्तित्व भी शामिल हो गए हैं।
जयराम रमेश का दावा है कि रक्षा मंत्री अक्सर ऐसे बयान देते हैं जिनका कोई ऐतिहासिक प्रमाण नहीं मिलता, और यह सब नेहरू को बदनाम करने के उस व्यापक प्रोजेक्ट का हिस्सा है।
स्वतंत्रता सेनानियों का अपमान और ऐतिहासिक सत्य
भाषण का एक भावुक हिस्सा वह था जहाँ जयराम रमेश ने स्वतंत्रता संग्राम और बलिदान की बात की।
उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि नेहरू के नाम पर बार-बार हमला करना और उनके खिलाफ अपमानजनक टिप्पणी करना असल में उन सभी वीरों का अपमान है जिन्होंने भारत की आज़ादी के लिए अपनी कुर्बानी दी थी।
उन्होंने तीखा कटाक्ष करते हुए कहा कि जब नेहरू और उनके साथी आज़ादी के लिए संघर्ष कर रहे थे, तब कुछ अन्य विचारधारा वाले समूह ब्रिटिश शासन (अंग्रेज़ों) के साथ मिलजुलकर काम करने के लिए तैयार थे।
रमेश के अनुसार, आज वही लोग नेहरू की विरासत पर सवाल उठा रहे हैं, जो ऐतिहासिक रूप से एक बड़ा विरोधाभास है।
निष्कर्ष
जयराम रमेश का यह भाषण केवल एक राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप नहीं है, बल्कि यह इतिहास को देखने के नज़रिए पर एक गंभीर विमर्श है।
यह लेख स्पष्ट करता है कि उनके अनुसार, नेहरू की आलोचना अक्सर तथ्यों के बजाय राजनीतिक द्वेष से प्रेरित होती है।
एक सरल उदाहरण (Analogy)
इतिहास एक विशाल वटवृक्ष की तरह होता है, जिसकी जड़ें देश के गौरव और बलिदान से सींची गई होती हैं।
यदि कोई व्यक्ति केवल इसलिए उस वृक्ष की जड़ों पर हमला करे क्योंकि वह उसके लगाए जाने वाले माली (नेहरू) को पसंद नहीं करता, तो वह अनजाने में पूरे वृक्ष की छाया और मजबूती को ही खतरे में डाल देता है।
जयराम रमेश के अनुसार, नेहरू के खिलाफ यह “प्रोजेक्ट” भी भारतीय लोकतंत्र की ऐतिहासिक जड़ों को कमजोर करने जैसा है।
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